त्वारित न्यािय भले ही नहीं मिले लेकिन न्यारय मिलने में हमेशा देरी भी नहीं होगी: उपराष्ट्रमपति


नई दिल्ली :उपराष्ट्रपति  एम. वेंकैया नायडू ने सभी हितधारकों- सरकार, बार एसोसिएशनों और अदालती पीठों से बड़ी संख्या में देश के न्यायालयों में लंबित पड़े मामलों को कम करने के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया है।नई दिल्ली में लोकतंत्र के स्तंभों पर वीरेंद्र भाटिया स्मारक व्याख्यान देते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि “त्वरित न्याय नहीं हो सकता है लेकिन इसमें लगातार देरी भी नहीं हो सकती है”। अन्यथा लोग अशांत हो जाएंगे और कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे।न्याय प्रक्रिया को लोगों के अनुकूल बनाने के लिए,  नायडू ने अदालती कार्यवाही स्थानीय भाषाओं में करने का आह्वान किया ताकि लोग इसे आसानी से समझ सकें। उन्होंने सुझाव दिया कि देशभर में उच्चतम न्यायालय की दो-तीने पीठें होनी चाहिए। इसके लिए संविधान में कोई संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी पीठें न होने के वजह से उच्चतम न्यायालय में मुकदमे लड़ने के लिए लोगों को दूर-दूर से दिल्ली आना पड़ता है और कई दिनों यहां रुकना पड़ता है। जो कि उनके लिए काफी खर्चीला होता है। उपराष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों तथा चुनाव से जुड़ी याचिकाओं पर एक तय समय सीमा के भीतर सुनवाई पूरी होनी चाहिए। उन्होंने विधायिकाओं के अध्यक्षों से अनुरोध किया कि वे दल बदल कानून के तहत सांसदों और विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने से संबंधित मामलों का निपटारा भी समयबद्ध तरीके से करें। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को भी यह काम प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए। उन्होंने इस बात पर चिन्ता व्यक्त की कि ऐसे मामलों की सुनवाई में देरी से जनता का विश्वास न्यायपालिकाओं और विधायिकाओं पर घटता है। नायडू ने कहा कि एक सक्षम, पारदर्शी, सुलभ तथा कम खर्चीली न्याय प्रणाली सुशासन की कुंजी है। इससे आम लोगों का जीवन आसान होगा और सरकार पर जनता का विश्वास बढ़ेगा। विधायिकाओं के कामकाज पर टिप्पणी करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि एक आम धारणा बन रही है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में बहस और चर्चाओं का स्तर लगातार गिर रहा है। उन्होंने विधायिकाओं में सभी से आत्मावलोकन करने तथा समाज के कल्याण के लिए रचनात्मक योगदान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध करने का अधिकार है लेकिन व्यवधान डालने का नहीं।

उन्होंने कार्यपालिकाओं को दलितों और समाज के हाशिये पर रहने वालों को प्राथमिकता देने का आग्रह किया और कहा कि ऐसे लोगों को न केवल विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों का प्रारुप तैयार करने में बल्कि उनके कार्यान्वयन में भी सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए। लोकतंत्र के चार स्तंभों- विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया का उल्लेख करते हुए,  नायडू ने कहा कि प्रत्येक स्तंभ को अपनी सीमाओं के भीतर रहते हुए काम करना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की ताकत इसके प्रत्येक स्तंभ की ताकत और एक दूसरे के पूरक होने पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि कोई भी अस्थिर स्तंभ लोकतांत्रिक ढ़ांचे को कमजोर कर सकता है।नायडू ने समाज में बटे हुए हर हिस्सों को पाटने के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करके पर जोर दिया जो अपनी क्षमताओं के अनुरूप बेहतरीन प्रदर्शन कर सके। उन्होंने कहा कि लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना और स्वराज्य को सुराज्य में तब्दील करना हमारा ध्येय होना चाहिए।

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